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"नहीं मैं वो अदा जो आशिक़ों की जान होती है, नहीं शम्मे हसीं जो महफिलों की शान होती है, मैं हूँ हालात पर लिखी हुई कोई ग़ज़ल गोया, 'हया' शामिल न हो तो शायरी बेजान होती है "

 

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"ऐ काश अपने मुल्क में ऐसी फ़ज़ा बने
मंदिर जले तो रंज मुसलमान को भी हो
पामाल होने पाए न मस्जिद की आबरू
ये फ़िक्र मंदिरों के निगेहबान को भी हो"



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