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"नहीं मैं वो अदा जो आशिक़ों की जान होती है, नहीं शम्मे हसीं जो महफिलों की शान होती है, मैं हूँ हालात पर लिखी हुई कोई ग़ज़ल गोया, 'हया' शामिल न हो तो शायरी बेजान होती है "

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लता हया वह नाम है जो उर्दू के मंचों पर महिलाओं के आत्मविश्वास
का नाम हैं। उनको सुनना और देखना ही मुकम्मल गजल की तरह हैं।
जितनी जगह उनकी शायरी में है। उतनी ही जगह उन्होने ग्लेमर की
दुनिया में बनाई हैं। ई-टीवी उर्दू के हर शनिवार को आने
वाले कार्यक्रम महफिल ए मुशायरा में उनके शेर अक्सर
सुनने को मिल जाते हैं। जब यह मारवाड़ी पंडित उर्दू में अपना
कलाम पढ़ती है तो मंच से लेकर जमीन तक वाह वाह की
आवाज गूंज उठती हैं।
- संजय सक्सेना

लता जी की शायरी में इन्सानियत का पैगाम है.
- शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद''

आज मुशायरों के मंच पर उस जैसी बा-बुलंद
आवाज़ में पढने वाली शायरा शायद ही कोई हो
-नीरज गोस्वामी

"आप सदा नेकनीयति से अपने विचारों को
प्रस्‍तुत करते हुए अपना कार्य करती हैं, बहुत अच्‍छा लगता है।"
- अविनाश वाचस्पति



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